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तरेड़

                                      दुलारचंद ने कुलाह सिर पर जमाया , शीशे के सामने खड़ा पगड़ी बाँधने लगा | शीशे पर ध्यान गया - अरे , शीशे पर तो तरेड़ आ गई है | घर में खंडित शीशा रखना तो शुभ नहीं | वैसे भी घर में कुछ भी तो शुभ नहीं हो रहा | आज हाट बाजार  जा रहा है - दूसरा शीशा ले ही आएगा | आज पहली बार हाट जाने का उत्साह नहीं है |
                                      गत वर्ष छोटे भाई नेमचंद का विवाह हुआ | दोनों भाईयों का परिवार बड़े प्रेम से रह रहा था | व्यापार में घाटा हुआ | दोनों पत्नियों के रहन -सहन की स्पर्धा ने घर में दीवार खड़ी कर दी | बंटवारा हो गया | पुश्तैनी मकान , पुश्तैनी व्यापार के दो हिस्से हो गए | आपस में बोलचाल बंद हो गई | बंटवारे में दुलारचंद ने कार ली और नेमचंद ने गाय -| दुलारचंद ने खिड़की से देखा - नेमचंद गाय दुह रहा है | दुलारचंद की पांच वर्षीया बेटी लाजो भागी आई | एक बड़ा खाली गिलास ले कर चाचा के पास खड़ी हो गई | लाजो  को देख कर नेमचंद मुस्करा दिया और झाग सहित दूध भर दिया | नेमचंद की बहू भी पास खड़ी देख रही थी , उसने कोई विरोध नहीं किया | बँटवारे के समय तो बहुत बढ़-चढ़ कर बोल रही थी | वह भी मुस्करा दी | लाजो ने वहीं खड़े -खड़े दूध का गिलास खाली कर दिया |
                                      दुलारचंद तैयार हो कर  कुर्सी पर बैठ गया | सोचने लगा -' मैं बड़ा हूँ | मुझे मेरे पद की गरिमा बनाकर रखनी चाहिए | किसी बात पर असहमत होकर या गलत बर्ताव से नाराज होना ठीक नहीं ! गलती हो या गलतफहमी - चुप्पी का दंश तो हमारे रिश्ते की खाई को बढ़ाएगा ही | वक्त रहते मुझे ही रिश्ते को बचाना है | शांखे रहेंगी , तो पेड़ भी हरा रहेगा |' वह पुनः शीशे के सामने खड़ा हो गया | अचानक हवा का एक झोंका आया | दुलारचंद ने देखा - शीशे में तरेड़ नहीं थी -एक बाल चिपक गया था , जो तरेड़ का आभास दे रहा था | यह तो कुदरत का इशारा था - दरार तो आई ही नहीं , न मन में , न शीशे में |
                                      बड़े उत्साह से दुलारचंद घर के बरामदे में आ गया और जोर से कहने लगा - " लाजो , मैं हाट जा रहा हूँ | सभी सामन मैं ही ले आऊंगा | किसी को हाट  जाने की जरुरत नहीं | "



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