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वटवृक्ष

          इंसान के दिमाग की सुरंग बहुत लंबी हुआ करती है, उसमें बेशुमार लड़खड़ाते अल्फाज़, दुःख भरे चलचित्र चलते रहते हैं। आसपास में कोई सुनने वाला हो या ना हो, पर वे शब्द खुद को ही सुनाई देते रहते हैं। यही स्थिति है-नब्बे वर्षीया रामप्यारी की। आसमान वाले से शिकायत भरे लहजे में इल्तिजा कर रही है, बड़बड़ा रही है-' इत्ती लंबी उमर कोई को ना देना। उमर छोटी हो पर चैन-सुकून की हो। मैंने क्या पाया? 20 वर्ष पहले पति का देहांत हुआ तो लगा-जीवन संध्या का अंतिम अध्याय आ गया। पर बेटे के परिवार के बीच जीवन के दिन सुकून से निकलते गए। 6 वर्ष पूर्व बेटा गुजर गया। सख्त जमीन पर चलते-चलते तलवे भी सुन्न हो जाते हैं, एक मां का जीवन तो नीरस होना ही था। ऐसे में अपनी साँसों को निबाहना अपनी मजबूरी होती है। अब....हे प्रभु, यह धरती फट क्यों नहीं जाती? कल एक सड़क दुर्घटना में जवान पोता चला गया। यह दुःख भी इन बूढ़ी आंखों के आगे !
            अचानक रामप्यारी को कोमल हाथों का स्पर्श हुआ, मानो तपती धरती पर शीतल जल के छींटे गिरे हों। रामप्यारी का 5वर्षीय पड़पोता गोदी में आने को बेचैन था। रामप्यारी ने उसे गोद में ले कर छाती से लगा लिया। उसमें एक उमंग भर गई और बड़बड़ाने लगी- 'मैं कमजोर नहीं हो सकती। मुझे इस बगिया में वटवृक्ष बने रहना है, जिसकी छत्रछाया में सब राहत महसूस करें।'

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