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मंगलमय शुरुआत

          नए साल का पहला दिन 365 पृष्ठों की कोरी किताब के पहले पन्ने के समान है। नकारात्मकता को त्यागकर पन्ने की शुरुआत सकारात्मक कदमों से हो, तो वर्ष भर खुशियां झोली में भरती रहेंगी। अच्छी सोच और विचारों के साथ की गई हर कोशिश जीवन का नजरिया ही बदल देती है। हो सकता है- छोटी छोटी कोशिशें एक बड़े बदलाव की नींव मजबूत कर जाए।
          बीते वर्ष मेरे मन में कई इच्छाएं जागीं, मेरी महत्वकांक्षाओं ने चूहे की भांति बिल से मुंह निकाला, पर बिल्ली रानी के पदचापों के आभास मात्र से....दुबक गई। आज गौर करती हूं, तो पाती हूँ-बिल्ली की आहट तो एक बहाना थी। मैं ही अकर्मण्य रही-मेरी महत्वाकांक्षा तो मात्र एक वैचारिक आकांक्षा थी।
          हर नई शुरुआत दुआओं के साए में हो, हम महफूज रहें- यह बड़ी चुनौती बन गई है। जाति, धर्म, गो-सेवा को ले कर आए दिन हो रही हिंसा ताईद करती है कि लोगों को कानून हाथ में लेने की छूट मिल गई है। भारत एक मूढ़ धार्मिक हिंसा की तरफ बढ़ने वाला देश बनता जा रहा है, फिर भला दिन मंगलमय कैसे हो ?
          मैं एक भारतीय इंसान हूँ-यह मेरी पहचान है, इस बात का मुझे गर्व है। पर अब तो देवी-देवताओं की जाति पर अनर्गल बयान दिए जा रहे हैं। संवैधानिक पदों पर बैठे लोग भले तय कर लें-'हनुमान की जाति क्या थी?' हम तो यह ठोंक बजा कर कह रहे हैं-'हनुमान हमारे आराध्य हैं, संकटमोचक हैं।'
          नव वर्ष में सभी को छांह सा सुकून मिले। मन में सदा आस्था बनी रहे। तलवे में कांटा चुभ भी जाय तो सिर पर प्रभु के हाथ का यकीन बना रहे। लगन की लौ सदा जलती रहे, जिससे जुनून के साथ महत्वाकांक्षा पूरी हो। जहाँ रहें, जैसे रहें- सुरक्षित रहें।
          नव वर्ष मंगलमय हो ।
          

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