Skip to main content

हमारी छुक-छुक रेल

                                                         गर्मी की छुट्टियों में बड़ा इंतजार रहता था - नानी के कब जायेंगे?  यह इन्तजार नानी के यहाँ जाने का इतना नहीं , जितना इन्तजार रहता था - ट्रेन में 24 घंटे का सफ़र तय करने का | पूरे रास्ते गुड़ की मीठी पूरी , नमकीन पूरी , अचार का स्वाद , कॉमिक्स पढने का मजा , आस - पड़ोस के यात्रियों से गपियाते , खिड़की से बाहर दृश्यों को ताकते --इन सब का अलग ही आनंद था | उस समय सफर में इत्मीनान था , सुकून था, पर अब वो कहाँ ?
                                                          पिछले माह हुई रेल - दुर्घटना ने तो हमें डरा ही दिया | ट्रेन में गड़बड़ी का अंदेशा लोको - पायलट द्वारा देने पर भी अनदेखा कर दिया गया | सोचो तो ड्राइवर के कहने पर ट्रेन को रोक लेते -सभी यात्री भले अपने गंतव्य पर देर से पहुँचते , पर सैंकड़ों घरों में कोहराम तो न मचता | सुरक्षा को ले कर चीख - पुकार सिर्फ दुर्घटना के समय होती है | घटना की जाँच का आदेश और मुआवजे की घोषणा करके इतिश्री कर ली जाती है | दुर्घटनाग्रस्त रेल के अनारक्षित डिब्बे में गठरी बन बैठे आदमी का तो शुमार इंसानों में नहीं गुमशुदा माल में हो जाता है  | सच तो यह कि दूसरे देशों में छोटी से छोटी दुर्घटना से सीख ले कर यह सुनिश्चित कर लेते है कि यह दोबारा न हो | पर हम बड़े हादसों को भी जल्दी ही भूल जाते हैं |
                                                           अधिकांश दुर्घटनाएं ट्रेनों के पटरी से उतरने और मानव - रहित क्रॉसिंग पर ही होती हैं | इसकी वजह पटरियों एवं डिब्बों का पुराना होना है | यदि सरकार इस और ध्यान दे तो यात्रा सुरक्षित रहेगी | सरकार कह रही है - ऐसी रेल चलाएंगे जो कश्मीर से कन्याकुमारी सिर्फ 12 घंटे में पहुंचा दे | एक ओर हम बुलेट ट्रेन एवं  टेल्गो ट्रेन चलाने के ख्वाब देख रहे हैं और दूसरी ओर रेल - पटरियों की स्थिति दिन -पर  - दिन  जर्जर हो रही हैं |
                                                          भारतीय रेल न केवल देश की मूल संरचनात्मक आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है , अपितु बिखरे हुए क्षेत्रों को एक साथ जोड़ने में और देश राष्ट्रीय अखंडता में भी संवर्धन करता है | संसाधन बढाए बिना ट्रेनों और योजनाओं की घोषणा तो उचित नहीं !

Comments

Popular posts from this blog

4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |                                                        1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...

लेखनी - एक अनजान की

**** मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे , तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे | मैंने ये कब कहा कि मेरे हक़ में हो जवाब , लेकिन खामोश क्यूं है तू कोई फैसला तो दे | बरसों में तेरे नाम पे खाता रहा फरेब , मेरे खुदा कहाँ है तू अपना पता तो दे | बेशक मेरे नसीब पे रख अपना इख्तियार , लेकिन मेरे नसीब में क्या है बता तो दे | ****

मैं पतंग मदमस्त

आसमां में छाई है लाल , पीली , नीली , ये सब हैं मेरी सखी - सहेली | पतंगों से सतरंगी है आसमान , मैं हूँ पतंग , मदमस्त , नभचर समान | कभी डगमगाती , कभी सम्भलती , पेंग बढ़ाती , कभी हिचकोले खाती | जब - जब चरखी है घूमती , तब - तब मैं आसमां हूँ छूती | चाह यही डोर का बंधन ना टूटे , संगी साथी का साथ कभी ना छूटे | लो , एक सखी का साथ छूट गया , पेंच बढ़ाते ही डोर का बंधन टूट गया | जोशीली आवाज आई - ' वो काटा ' कई हाथों ने लूटा , छीना - झपटा | कहीं करतल ध्वनि किलकारी  झूम रही , कहीं हुन्करणों से वातावरण गूंज रहा | मैं भर - भर कुलांचे इठलाऊँ , और  स्वछंद , उन्मुक्त हो उड़ जाऊँ | मैं आकाश के सीने को चीर लूँ , मैं पतंग - विजय - पताका फहरा लूँ