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कोहरा

यह कैसा तिलिस्म - सा लगता है
कोहरे में सब धुंधला ही लगता है |
घनघोर कोहरा सोख रहा है रोशनी ,
सूरज भी तलाश रहा पृथ्वी अपनी |

स्तब्ध -मौन है चहुँ ओर का शोर ,
तन्हाई भरी लम्बी रातों का भोर |
नुक्कड़ - नुक्कड़  पे अलाव हैं सुलगते ,
चरम सुख मिलता है जब चाय हैं सुबड़ते |

रोशनदान पर बैठा कबूतर रहा ठिठुर ,
गर्दन दबा , भूला गुटुर - गुटुर |
रगड़ कर हम गर्मास दे रहे हथेलियों को ,
हथेली से ही ताप रहे चेहरे को |

कल दिख रहा था मंदिर का झंडा ,
आज नहीं दिखा चौबारे का खम्भा |
धुंध में राह पार करना नहीं होता आसान ,
एक-एक पग चलने पर हो जाता भान|

जीवन में छाए कोहरे को भी मिटाना होगा ,
तन्हाई , अवसादों को दूर भगाना होगा |
एक चाह- हर पल हो उल्लासों का मेला ,
जीवनं में नहीं रहे कोई अकेला |


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