अपने ही देश में फैला कैसा यह आतंक ,
अपने ही अपनों से हैं, भयभीत - राजा हो या रंक।
दूध ,फल , तरकारी , सब हैं मिलावट से तराबोर ,
साँसें हुई सस्ती ,यह कैसा कारोबार ?
रिसते जख्म , पीकर मिलावट का जहर ,
नासूर बन पड़ रहा स्वास्थ्य पर कहर ।
लूट - खसोट , साजिशों का तूफान , बढ़ता भ्रष्टाचार ,
ढा रहा आम जनता पर हो घोर अत्याचार ।
कौड़ियों के मोल हुए , जान ईमान इंसान के ,
बढ़ रही रंजिश , दुश्मन हुआ भाई - भाई के ।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ - जुमला सुना सदा ,
हो रही अस्मिता की हत्या , है हर कोई गमजदा ।
भूखे गिद्ध के मानिंद , कुचल रहे नारी सम्मान ,
भीतर है खौफ , गली - गली में हो रहा मान - मर्दन ।
वैज्ञानिक युग में सफर हुआ , क्यों अनिश्चित , असुरक्षित ,
लापरवाही की इंतिहा , जिंदगियां हुई उपेक्षित ।
राम नाम का जाप करो , जीवन छुक-छुक रेल भरोसे ,
बेपटरी होती ट्रेनें , दहकते दर्द ,अहकती साँसें ।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से, बन बैठे योगी ,
चल चरित्र से है ये लम्पट , योगी नहीं , हैं भोगी ।
पाखंडी बाबाओं के दोगलेपन से ,श्रृद्धा पर पड़ रही मार ,
'विश्वास ' से हो रहा खिलवाड़, अध्यात्म बन गया व्यापार ।
संतों ने भक्तों की जीवन नैया है डुबो दी ,
तो डॉक्टरों ने आमजन की साँसें ही रोक दी ।
बेबस , दीन हैं मरीज , अस्पताल ही हैं स्वयं बीमार ,
अब डॉक्टर और अस्पताल कर रहे, मौत का व्यापार ।
राग द्वेष की चिंगारी ,फैल रहा विद्रूप व्यभिचार ,
जातिवाद का नरपिशाच है सिर पर सवार ।
हे प्रभु , संकट से उबारो ,
धरती माँ कर रही पुकार,
पापियों के विनाश को , ले लो अब तो अवतार ।
अपने ही अपनों से हैं, भयभीत - राजा हो या रंक।
दूध ,फल , तरकारी , सब हैं मिलावट से तराबोर ,
साँसें हुई सस्ती ,यह कैसा कारोबार ?
रिसते जख्म , पीकर मिलावट का जहर ,
नासूर बन पड़ रहा स्वास्थ्य पर कहर ।
लूट - खसोट , साजिशों का तूफान , बढ़ता भ्रष्टाचार ,
ढा रहा आम जनता पर हो घोर अत्याचार ।
कौड़ियों के मोल हुए , जान ईमान इंसान के ,
बढ़ रही रंजिश , दुश्मन हुआ भाई - भाई के ।
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ - जुमला सुना सदा ,
हो रही अस्मिता की हत्या , है हर कोई गमजदा ।
भूखे गिद्ध के मानिंद , कुचल रहे नारी सम्मान ,
भीतर है खौफ , गली - गली में हो रहा मान - मर्दन ।
वैज्ञानिक युग में सफर हुआ , क्यों अनिश्चित , असुरक्षित ,
लापरवाही की इंतिहा , जिंदगियां हुई उपेक्षित ।
राम नाम का जाप करो , जीवन छुक-छुक रेल भरोसे ,
बेपटरी होती ट्रेनें , दहकते दर्द ,अहकती साँसें ।
मर्यादा पुरुषोत्तम राम के नाम से, बन बैठे योगी ,
चल चरित्र से है ये लम्पट , योगी नहीं , हैं भोगी ।
पाखंडी बाबाओं के दोगलेपन से ,श्रृद्धा पर पड़ रही मार ,
'विश्वास ' से हो रहा खिलवाड़, अध्यात्म बन गया व्यापार ।
संतों ने भक्तों की जीवन नैया है डुबो दी ,
तो डॉक्टरों ने आमजन की साँसें ही रोक दी ।
बेबस , दीन हैं मरीज , अस्पताल ही हैं स्वयं बीमार ,
अब डॉक्टर और अस्पताल कर रहे, मौत का व्यापार ।
राग द्वेष की चिंगारी ,फैल रहा विद्रूप व्यभिचार ,
जातिवाद का नरपिशाच है सिर पर सवार ।
हे प्रभु , संकट से उबारो ,
धरती माँ कर रही पुकार,
पापियों के विनाश को , ले लो अब तो अवतार ।
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