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अप्रत्यक्ष सेवा

                             राजश्री महीने के आखिरी शनिवार -रविवार घर की साफ - सफाई करती है । आज ननद - भौजाई सफाई - अभियान में जुटी हुई हैं । संगीता ने अपनी किताबों की अलमारी , कपड़ों की अलमारी , कमरे की सफाई की । राजश्री ने रसोई की सफाई की । प्रायः रसोई में टूटे -फूटे प्लास्टिक के , लोहे के डब्बे निकल ही जाया करते हैं । राजश्री को कबाड़ सहेज कर रखना पसंद नहीं । सफाई हो तो पूरी हो ! वैसे भी उसने कहीं पढ़ा था - ' घर में कबाड़ इकट्ठा करने से नकारात्मक भावनाएं भी इकट्ठी होने लगती हैं । ' उसने उन डब्बों को भी कूड़े की बाल्टी में डाल दिया ।
                               राजश्री ने संगीता को आवाज दी - " सारी सफाई हो जाए तो नुक्कड़ पर रखे बड़े डब्बे में यह बाल्टी पलट आना । "
                                " जी भाभी । " संगीता बाल्टी उठाने को हुई , तो उसे प्लास्टिक के डब्बे , रसगुल्ले के खाली डब्बे दिखाई दिए । उसने उन्हें निकाल लिया , सोचा - ' यह तो अटारी वाले को ही दे दे देंगे , कुछ रुपये आएंगे । ' नगरपालिका के डब्बे में बाल्टी पलट दी , लौटने लगी । दो निर्बल , अधनंगे बच्चों को कहते सुना - " अरे , ५ नंबर वाले मकान की आंटी के यहाँ से जो कचरा आता है ना , उसमें बहुत सामान मिल जाता है । २०-२५ रुपये एकसाथ बन जाते हैं । भरपेट खाना खाता हूँ । "
                                   संगीता को अपने किए का अफ़सोस हुआ । तुरंत घर में रोके हुए कबाड़ को बाल्टी में डाल लिया । रसगुल्ले के डब्बे में दो ठंडी रोटी और अचार रख दिया । पुनः बाल्टी को पलटने के लिए ले आई । देखा- वे बच्चे कूड़े में .....ढूंढ रहे थे । संगीता ने बाल्टी को डब्बे के बाहर ही एक कोने में पलट दिया । संगीता को अपनी भाभी पर नाज हुआ और उन मासूमों के चेहरे पर आई ख़ुशी देख कर आत्म संतोष हुआ ।

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