Skip to main content

एक लघु कथा -सूत्र

आज तो हद ही होगी - स्कूल की बस घर के सामने खड़ी है , ड्राइवर हॉर्न दे रहा है और आर्यन अपने दोस्त से मोबाइल पर बात ही कर रहा है । मैंने मोबाइल हाथ से छीना , तब भागा । सुबह से आर्यन के इस व्यवहार से मेरा मन खिन्न है , इसकी दोस्तों से इतनी क्या बातें होती हैं ! रोज स्कूल में  मिलते ही हैं ! सारे दिन मोबाइल पर घंटों बाते करता रहता है - पढ़ाई का हर्जा और अतिरिक्त खर्चा । इसे वित्तीय स्वतंत्रता क्या दी गयी , यह फ़ायदा ही उठा रहा है । महीने के अंत में 2500-3००० रुपयों का बिल - एक आम बात हो गयी है | फटकारो , तो गुस्से में बड़बड़ाने लगता है । बड़ों के लिए अजब सी दुविधा है कि आज के सुविधा संपन्न और स्वछंद परिवेश में परवरिश की दिशा क्या हो ? बच्चों में चिड़चिड़ापन ,आक्रामक व्यवहार और जल्दी गुस्सा आना एक आम समस्या हो गई है । शुक्र है - स्कूल में मोबाइल ले जाने कि इजाजत नहीं है । श्रीमान जी तो चाय पीते पीते अखबार पढ़ने में व्यस्त हैं , पर मेरा टेंशन बढ़ता ही जा रहा है ।
इन्होने अखबार समेटते हुए कहा - " मौसम बहुत अच्छा है , बारिश हो कर चुकी है । चलो ,थोड़ा घूम आते हैं । हरियाली का लुत्फ़ उठाया जाय । घर बंद करके  सड़क पर आये । मैंने देखा - घर के गेट के पास लगी स्ट्रीट लाइट के खम्भे पर बरसाती बेल चढ़ गई है , जिस से बल्ब भी थोड़ा ढक गया है । मैंने इनका ध्यान इस ओर करा और कहा - " इस बेल को तो हटाना होगा  , पर इस खम्भे पर चढ़ेगा कौन ? "
 " अरे , चढ़ने की क्या जरुरत है ? बेल की जड़ को ही उखाड़ दो । ४-५ दिन में सूखी बेल खुद ही नीचे गिर जाएगी । यह तो प्रकृति का नियम  है - फैली बुराई को दूर करना हो तो उसकी जड़ पर ही वार करो । " यह कहते- कहते इन्होंने बेल की जड़ को जोर से उखाड़  दिया । मैं मुस्करा दी । मुझे मेरे तनाव को दूर करने का रास्ता मिल गया । आर्यन को सुधारने का सूत्र मेरे हाथ लग चुका।
नियत समय पर आर्यन स्कूल से आ गया । खाना खाया और मोबाइल हाथ में -। थोड़ी देर में आर्यन के चिल्लाने की आवाज आई -  " मम्मी , आपने मेरा मोबाइल प्री - पेड कर दिया  ? मैसजे आया है । "
" हाँ " कह कर मैं अपने काम में जुट गई ।

Comments

Popular posts from this blog

बोनसाई

                                        चाय का पानी उबल रहा है-पास खड़ी प्रतिभा का ध्यान कहीं और है, विचारों के तूफान में फँसी हुई है | बिटिया मिता की आवाज़ ने चौंका दिया- 'माँ, किस के लिए काढ़ा बना रही हो ? ' 'अरे , नहीं चाय बना रही हूँ|'  कह कर प्रतिभा ने चाय पूरी बनाई और छानकर परेश के सामने रख दी| आज रविवार है-मिता और दीप की छुट्टी है पर परेश के लिए तो रविवार- सोमवार एक समान ही हैं | सातों दिन एक से हो तो 365 दिनों में कोई दिन खास हो सकता है यह कैसे मान लिया जाय ! परेश का सुबह घर से जाना और रात को लौट कर आना- वही प्रतिभा ...वही घर....वही दीवारें ....वही सन्नाटा ..| जिन्दगी में मानो  नीरसता आ गई है | एक ठहराव आ गया है जो पीछे मुड़ कर देखने को विवश कर ही देता है |                                           मिता 5 वर्ष की और दीप 8 वर्ष का , सास- ससुर साथ में ही थे | घर के कामों स...

4o वर्ष पूर्व ------मेरे जीवन की एक रोचक घटना -प्रथम पुरस्कार |

                                                       अब तक आपके जीवन में भी कई घटनाएँ घटी होगी ,जिन्हें याद करके कभी आप रो पड़ते होंगे , तो कभी अनायास आपके होठों पर हल्की मुस्कान आ जाती होगी | मेरे जीवन में भी एक रोचक घटना घटी जो कि मेरे लिए काफी प्रेरणास्पद रही , जिसे में कभी भूल नहीं सकती | सच कहूँ तो इस घटना ने मुझे नानी याद दिला दी , दाल- रोटी के सब भाव  मालूम पड़ गए |                                                        1975 में गर्मी की छुट्टियाँ चल रही थी | राशन की बड़ी हायतौबा मच रही थी | मालूम पड़ा - फलाने  दिन दुकान पर राशन आने वाला है , पर भेजा किसे जाय ? माताजी सबकी तरफ प्रश्न भरी निगाहों से देखने लगीं | राशन लाना ,मतलब पूरा दिन लगा देना | नौकर ने गौने के लिए यही दिन उचित समझा अतः छुट्टी ...

चौराहे पर --------1978 में लिखित

      उत्पन्न हुआ एक निराला शौक ,       निकल पड़ी मैं करने मोर्निंग वॉक       बजे थे छः उदित सुबह के ,       जैसे ही पहुंची द्वार निज घर के |       दिख पड़े अभिमानी , दक्षिणा-ग्राहक पंडित,       बरस रहे थे नन्हे बालक पर हो क्रोधित |       स्पर्श हो गया था वह बालक उनसे ,       हुई यह छोटी सी गलती उससे      'नाश हो तेरा , नीच अधम ' वे बोले ,      करते रहे उसे अपमानित मुँह खोले |      अपराधी-सा मौन खड़ा वह बालक ,      भरी भीड़ में बना पात्र नालायक |      उठ पड़ा ब्राह्मण का हाथ ऊपर ,      पर करा नीचे कुछ सोचकर |     चले गए वे यह बड़बड़ाकर -     'करना पड़ेगा अब स्नान मुझे जा कर '|                                   मुझ में न जाने क्या विचार जागे ,             ...