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एक भरोसा

                                          बुआ से लगाव मुझे सदा रहा | या यूँ कहो - बुआ के लिए मैं भी प्रिय भतीजा रहा | जिंदगी में उन रिश्तों की उम्र लम्बी नहीं होती , जो एकतरफा होते  हैं | बुआ की आत्मिक वात्सल्यता और मेरे दिल में उनके प्रति सम्मान में कभी कमी नहीं आई | बस , मेरे दिल में एक टीस से आत्मग्लानि बनी हुई है | पता नहीं - उनसे एक झूठ बोलकर मैंने सही किया या गलत !                                           पिछले वर्ष उनकी तबियत काफी नरम हो गई थी , उन्हें अस्पताल में भर्ती करा गया | उनके शरीर को अतिरिक्त खून की सख्त जरुरत थी | घर के सभी स्वस्थ सदस्यों के खून की जाँच हुई, पर किसी से उनका खून मेल नहीं खाया | उस समय मैंने भी अपने खून की जाँच कराई | अन्ततः बुआ को किसी अनजान ब्लड - डोनर के द्वारा ही खून दिया गया | खून तो शरीर में बहता है , वह व्यक्ति कौन है ? किस जाति का है...

आधार का आभार

                                            रामदीन एक खेतिहर मजदूर- दूसरों के खेत में मजदूरी करना ही इसका कमाई का साधन रहा | परिवार में बूढी मां , पत्नी और तीन बच्चे हैं | इस वर्ष तो अकाल से खेत तो सूखे ही , घर में भी खाने के लाले पड़ गए , तिस पर बीमार मां | चार दिन से चूल्हा नहीं जला , आज तो अनाज की व्यवस्था करनी होगी | यह पीतल का मटका किस काम का ? पत्नी को बता कर वह मटका बाजार ले गया और उसे बेचने पर  २०० रुपये उसके हाथ में आये | तभी उसने देखा - एक जीप पर सवार एक व्यक्ति माइक से घोषणा कर रहा था - ' सरकार इस गाँव में पक्की सड़क बनाना चाहती है , जिसके लिए मजदूरों की जरुरत होगी , जो भी काम करना चाहता हो , अपना नाम यहाँ की पंचायत में लिखा दे | ' रामदीन ने सोचा - ' इस काम में देर क्यों करूँ ' तुरंत पंचायत में पहुंच कर मजदूरों में अपना नाम लिखा दिया | अगले दिन से अपनी हाजिरी लिखाकर अन्य मजदूरों के साथ सड़क खुदाई में जुट गया |               ...

दो पल ....फुरसत के

कुछ बीते लम्हें यादों में ठहरे हैं , उनीदीं आँखों में ख्वाब सुनहरे हैं | समय के साथ भागमभाग कर रहे हम , चल न सके कभी फुरसत के चार कदम |                           आओ , दो पल फुरसत के नाम करें || कुछ मुरीदों के ढेर , कुछ मुनिदों के धागे , जुड़ता रहा नया सफा जिन्दगी के आगे | पलटते रहे कलेंडर के पन्ने ,गुजरते रहे दिन , साल | अपना चेहरा देख आईना भी पूछ रहा सवाल |                           आओ , दो पल फुरसत के नाम करें || उबरना चाहती हूँ अनचाही लम्हों की चुभन से , जागना नहीं चाहती , उस तिलस्मी ख्वाबों से | सुबह आने से पहले रात गुजर जायेगी , नजारों की ये हंसीं मुलाक़ात गुजर जाएगी |                          आओ , दो पल फुरसत के नाम करें || रोज उसी मंजिल जाना है और आना है , फिर इन क़दमों में इतनी हड़बड़ी क्यों है ? जिंदगी के हसीन यादों के दरख्त बढ़ने दें , चुभती यादों की खरपतवार उखाड़ दें | ...

मॉर्निंग वाक

                                                    उम्र की झलक चेहरे पर , तन पर दिखने लगी , शिथिलता और थकान महसूस होने लगी , तो स्वास्थ्य के प्रति जागृत होने की भावना भी जाग उठी | लो जी , हमने प्रातः-सैर शुरु कर दी | हाँ , सही फरमाया - ' मोर्निंग वाक '| घर पास ही बहुत बड़ा पार्क है | प्रातःकाल-सैर के लिए उचित जगह है | सूरज की बाट जोहती पहली किरण से भी पूर्व सैर के लिए निकल जाती हूँ |                                                       यह पार्क सुनियोजित तरीके से बड़े वृक्षों , छोटे पौधों से सुसज्जित है | इस समय गुलमोहर की बहार है और नीम के वृक्ष नव पत्तों और निम्बोली से आच्छादित हैं | इन वृक्षों को देख कर लगता है - कुदरत की नेकियों से बहुत कुछ सीखा जा सकता है | जड़ें जितनी गहरी होती हैं , पेड़ का फैलाव भी उतना ही ज्यादा होगा ...

छुट्टियों में ....

छुट्टियों में बच्चों का घर पर आना , है बड़ा सुखद जीवन बन नानी - नाना | सिद्धांत ,सुहानी ,गौरांश  और रिवान , देख इन्हें आती लबों पे मीठी मुस्कान | ह्रदय इनके हैं मासूम , कोमल सरीखे , दूर इनसे  द्वेष - दंभ के कांटे तीखे | हर चीज जानने को मन बड़ा हठीला , उत्सुकता प्रबल, है मन बड़ा बावला | आपके यहाँ इत्ती गर्मी क्यों ? सुबह ये मोर शोर मचाते क्यों ? नन्हीं चींटी दाना ले कर चढ़ती क्यों ? दीवार पर सौ बार फिसलती क्यों ? रोज -रोज नानू टॉफी दिलाते क्यों ? तो नानी , आप नाराज होती क्यों ? एक स्मार्ट फ़ोन हमारे पास हो तो , हमारी मम्मा को समझाओ तो | रोना मचलना है अधिकार इनका , मोती से आंसू है हथियार इनका | दृगों में कुतूहल है छलक रहा , मुख पर विजय - गर्व  झलक रहा | प्यारा - सा खेल - खिलौना बचपन , भागती दुनिया में सुकून - सा बचपन | ये रोम-रोम आल्हादित कर जाते , नाना-नानी को 'फुल रिचार्ज ' कर जाते |

कंगन

                                                       दो दिन बाद सावित्री और रोहित की इकलौती बेटी विभा की शादी है | शादी में रोहित के सभी अपने रिश्तेदार आए हैं , पर सावित्री का मन उदास है  | शादी में शामिल होने के लिए विदेश से भाई नीरज अकेला आया है , भाभी नीरा नहीं आई | पीहर के नाम पर एक भाई ही तो है | महिलाओं के जीवन का बड़ा सच है कि पीहर की देहरी भले ही फेरे लेते ही पराई हो जाती है , पर पीहर से आत्मीयता कभी कम नहीं होती | भाई - भाभी दोनों ही शादी में शामिल होते तो रौनक बढ़ जाती | वैसे भी विभा अकेली बेटी , बाद में कौनसा मौका आएगा , जिसमें वे बहन के घर विदेश से आयेंगे ! अचानक विभा की आवाज से सावित्री का ध्यान भंग हुआ - ' रमेश मामा आ गए , मामी आ गई | ' नीरज का दोस्त रमेश , जिसने सावित्री को हमेशा बड़ी बहन का मान दिया | सावित्री भी रमेश और रमा के व्यवहार से सदा खुश रही | दोनों को देखते ही सावित्री के चेहरे पर चमक आ गई | लगा - रिश्ते खून के ही नहीं...

बहती गंगा

                           अचानक निरीक्षण के लिए सरकारी अधिकारी पहुँच गए | स्टोर कीपर को पुकारते हुए स्टोर में प्रवेश किया | रजिस्टर को हाथ में लेकर सभी सामनों की जाँच - पड़ताल हुई | स्टोर के बाहर दरवाजे के पास एक बड़ा तख़्त पड़ा हुआ था | उसकी एंट्री रजिस्टर में थी | अधिकारी ने पूछा - " इसे स्टोर के बाहर क्यों रखा है ? " स्टोरकीपर - " सर , यह तख़्त बहुत बड़ा है , स्टोर के अन्दर नहीं जा पा रहा है , इसलिए बाहर रखा है | " अधिकारी - " तुम सही कह रहे हो , यह जरुरत से ज्यादा बड़ा है | तुम्हें अड़चन ही दे रहा है | ऐसा करो - यह मेरी कोठी भिजवा दो , वहां से छोटा तख्ता ले आना | कुछ ही देर में रजिस्टर में लिखे ' तख़्त ' में 'आ ' की मात्रा लगा दी गयी और ' तख्ता ' लिखा गया |                              दो दिन की छुट्टी बिताने के बाद बड़े बाबू दफ्तर पहुंचे | स्टोर के दरवाजे के पास रखा तख़्त कुछ छोटा लगा | स्टोरकीपर से जानकारी ली | पूरा किस्सा ही जान गए | बड़े बाब...